छिपा रहता अथाह भाव सागर अन्तस् के गहरे विवर में यूँ हीं कभी ज्वार जब आ जाता तटबंधों को आप्लावित कर देता अजस्त्र धाराएं बेकल हो फूटती स्रोतस्विनी कल-कल कर बहती तीव्रगामी हो प्रवाहित हो जाती उलचती औचक कोरे कागज पर निज व्यथा में आकंठ डूबोती अनुभूत सत्य की मर्मस्पर्शी पीडाएं आकुल अंतर से अनुभूतियाँ बतलाती नम हो नैत्रों की कोरें भिगोती कवि मन से जब बाहर छलकती विद्रूपताएं ,विषमताएं रोष भर देती बंध तोड़ प्रस्फुटित हो जाती निराश ह्रदय में नव आशा जगाती कवि की जब लेखनी चल जाती सुषुप्त मानव को देता उद्बोधन भाव प्रवाह जब नव रस में बहता मानव् अग्रसर कर्मपथ पर होता निमीलित करती स्वप्निल आकांक्षाएं अतृप्त वासनाएं झलक दिखलाती जीजिविषाएँ मुखरित हो जाती आश्रय पाती प्रिय स्कन्ध पर भावावेग बंध तोड़ अपने सेतु से रवि न पहूँचता वहाँ कवि मन पहुँचता सुगाह्य कथन का अनुसरण करता हर्षातिरेक से मनमयूर नाचता जग में उथल-पुथल कर देता पल में शुरातन शूरों को चढ़ाता अनायास जब कवि मन गीत गाता मुमुक्षु मानव साधना रत होता अपने ही मन में लगा कर गोता जान न पाया थाह अब तक ये भव रत्न कितने छिपाएँ है कवि मन
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